तमिलनाडु में हुए हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजों ने जहां दो दशक से ज्यादा समय से चली आ रही कांग्रेस और डीएमके की दोस्ती को एक झटके में तोड़ दिया है, वहीं इसने केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए एक उम्मीद जगा दी है। सियासी गलियारों में ऐसी चर्चा है कि भाजपा कांग्रेस और डीएमके के बीच रिश्तों में खटास को भुनाने की कोशिशों में जुट गई है। हाल ही में डीएमके ने कांग्रेस को ‘पीठ में छुरा घोंपने वाला’ कहा है। इसके अलावा DMK ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को चिट्ठी लिखकर सदन में बैठने की नई व्यवस्था करने का अनुरोध किया है, क्योंकि पार्टी नहीं चाहती कि उसके सांसद सदन में कांग्रेस के साथ बैठें।
सूत्रों के हवाले से NDTV की रिपोर्ट में कहा गया है कि भाजपा इन्हीं राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाना चाहती है और ऐसी संभावनाओं की तलाश में जुट गई है कि कैसे DMK को फिर से अपने पाले में लाया जाए और संसद में अपने संख्या बल को मजबूत किया जाए। सूत्रों ने बताया है कि BJP की यह उम्मीद जगी है कि DMK कुछ मुद्दों पर उसके साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार हो सकती है। दोनों दल पहले भी एक गठबंधन में रह चुके हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में डीएमके NDA का हिस्सा थी लेकिन 2004 में जब यूपीए की सरकार बनी तो DMK पाला बदल लिया था और तब से कांग्रेस की सहयोगी बनी हुई थी।
अब जब दोनों दलों की राहें जुदा हो चुकी हैं, ऐसे में भाजपा DMK की राजनीतिक कमजोरी का फायदा उठाने की भी सोच रही है, क्योंकि उसे विधानसभा चुनावों में एक नई पार्टी (TVK) के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा है। ऊपर से कांग्रेस उसे छोड़कर TVK के साथ जा खड़ी हुई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी भी क्षेत्रीय पार्टी के लिए राज्य और केंद्र, दोनों जगहों पर विपक्ष में रहना मुश्किल होता है। ऐसे में, BJP सूत्रों का मानना है कि DMK को केंद्र के साथ मिलकर काम करने के लिए मनाना शायद ज्यादा आसान हो सकता है।
हालांकि, DMK और BJP की दोस्ती में दो बड़े रोड़े हैं। पहला परिसीमन और भाषा विवाद और दूसरा सनातन विरोध। DMK, केंद्र सरकार की प्रस्तावित परिसीमन योजना की मुखर विरोधी रही है। इसके अलावा त्रिभाषा फॉर्मूले पर भी DMK केंद्र का विरोध करती रही है। उसने पूरे विधानसभा चुनाव अभियान को परिसीमन के मुद्दे के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रखा था, जिसे उसने “दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व पर BJP का हमला” करार दिया था। ऐसे में MK स्टालिन के नेतृत्व वाली DMK के लिए इस मुद्दे पर अपने रुख में नरमी लाना आसान नहीं होगा। दूसरा मुश्किल मुद्दा सनातन धर्म पर DMK का रुख है, जिसने उसे लगातार BJP के खिलाफ खड़ा किया है। पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन की सनातन धर्म के खिलाफ बार-बार की टिप्पणियों और इसे खत्म करने की मांगों ने लंबे समय से BJP और DMK को आमने-सामने ला खड़ा किया है। दोनों पक्षों के लिए इस स्थिति से निपटना एक मुश्किल काम होगा।
दरअसल, भाजपा की अगुवाई वाले NDA के पास संसद में दो तिहाई बहुमत हासिल नहीं है। इसी संख्या बल की कमी की वजह से हाल ही में परिसीमन बिल लोकसभा में गिर गया था। दो तिहाई संख्या बल जुटाने में सरकार नाकाम रही थी और उसे 54 वोट कम पड़ गए थे। इसलिए भाजपा को ऐसे साथी की दरकार है जो, NDA में शामिल हुए बिना भी उसकी मदद कर सके। सूत्रों के मुताबिक, असल में भाजपा DMK के साथ वैसा ही रिश्ता बनाने की उम्मीद कर रही है, जैसा उसका नवीन पटनायक की बीजू जनता दल (BJD), जगन रेड्डी की YSRCP और के. चंद्रशेखर राव की BRS जैसी पार्टियों के साथ है; ये पार्टियां NDA का हिस्सा न होते हुए भी केंद्र सरकार को मुद्दों के आधार पर अपना समर्थन देती हैं। बता दें कि DMK के पास लोकसभा में 22 सांसद हैं। अगर वह NDA के साथ आती है तो सरकार पर आंकड़ों का बोझ कम हो सकेगा।

