23 जून की सुबह मोहल्लों की गलियां सूनी थीं। मानों कोई सगा चला गया हो। हर घर का कोई न कोई व्यक्ति उन पीड़ित परिवारों को ढांढ़स बंधाने पहुंचा था, जहां करुण क्रंदन हो रहा था। घरों में मचे चीख-पुकार सुनकर रूह कांप जा रही थी।
मांओं, बहनों का विलाप झकझोर रहा था। परिवारीजन, रिश्तेदार बात नहीं कर पा रहे थे, पर उनके चेहरों पर गम और गुस्सा साफ झलक रहा था।
सजल नेत्र और माथे की भंगिमाएं प्रश्न कर रहे थे कि इस तरह के अग्निकांड कब तक होते रहेंगे? कब तक लोग स्वजन को खोते रहेंगे? अलीगंज अग्निकांड में जान गंवाने वालों के घर दिनभर सांत्वना देने लोग आते रहे। सभी गम और गुस्से में थे।
मार्टिनपुरवा निवासी 27 वर्षीय निलेश कुमार के भाई अभिषेक का कहना है कि यह केवल हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है।
निलेश पिछले तीन वर्षों से गेमिंग कंपनी के लिए डिजाइनिंग कर रहा था। अभिषेक कुमार ने कहा कि पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता मिल गई है, लेकिन इससे उनका भाई वापस नहीं आएगा।
निलेश कुमार की अंत्येष्टि के बाद उनके घर पर सन्नाटा रहा।
इतने बड़े भवन में अग्नि सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं थे, निकासी मार्ग की व्यवस्था क्यों नहीं थी और बिना मानकों के ऐसे संस्थान कैसे संचालित हो रहे थे? यदि संबंधित विभाग समय रहते कार्रवाई करते तो कई परिवार उजड़ने से बच सकते थे। बिजली विभाग से सेवानिवृत्त निलेश के पिता शत्रुघ्न लाल व मां संतोष का रो-रोकर बुरा हाल है।
सुखमनी की अर्थी उठी को फफक पड़ीं स्वजन।
इन बातों को याद कर प्रभजोत फफक पड़े। वह बोले काश, मैं बेटे को बचा पाता। अलीगंज के अग्निकांड में जान गंवाने वाले 23 वर्षीय सुखमनी को सोमवार को गमगीन माहौल में अंतिम विदाई दी गई। उनके पिता प्रभजोत और मां किरन कौर बेसुध थे। भाई सायमन भी बेहाल था।
मंगलवार को दिलकुशा श्मशान घाट पर 13 वर्षीय छोटे भाई ने बहन को मुखाग्नि दी तो हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। परिजनों ने बताया कि अनुच्छा सोमवार का व्रत रखती थी।
बार-बार बेटी अनुच्छा की फोटो देखती रहीं मां कुमारी राई।
घटना वाले दिन भी वह सुबह जल्दी उठी। पूजा-पाठ किया और व्रत भी रखा। इसके बाद स्कूटी से अलीगंज स्थित अपने कार्यालय के लिए निकली थीं।
बालागंज के बरौरा हुसैनबाड़ी अल्मास बाग कॉलोनी में मंगलवार की सुबह हर आंख नम थी। जिस बेटे के सहारे एक परिवार भविष्य के सपने बुन रहा था, उसी 24 वर्षीय अब्दुल रहमान का जनाजा घर से उठ रहा था। अब्दुल के पिता मोहम्मद अफजाल 2022 से पैरालाइज हैं।
मां फहमीदा खातून गृहिणी हैं और बड़ी बहन अलीना की शादी हो चुकी है। परिवार की जिम्मेदारी अब्दुल के कंधों पर थी। उनके मौसेरे भाई अमान अली ने बताया कि अब्दुल की लगभग छह महीनेे पहले नौकरी लगी थी। मां-बाप की दवाइयों से लेकर घर के छोटे-बड़े खर्च तक अब्दुल ही संभालते थे।
अब्दुल रहमान के घर दिनभर सांत्वना देने आते रहे लोग।
पिता की बीमारी के कारण जो मुश्किलें थीं, उन्हें कम करने के लिए वह दिन-रात मेहनत कर रहे थे। सोमवार सुबह करीब 10 बजे अब्दुल रहमान रोज की तरह घर से निकले थे। किसी ने नहीं सोचा था कि यह उनकी आखिरी विदाई होगी। पोस्टमार्टम के बाद देर रात करीब ढाई बजे जब उनका शव घर पहुंचा तो मां बिलख उठीं।
मंगलवार को भविष्य का शव गांव पहुंचा। उसकी बहन प्रिशा शर्मा है। पिता नरेंद्र शर्मा थाना कलां स्थित ब्रह्मशक्ति स्कूल में शिक्षक हैं, जबकि मां सोनिया घर पर कपड़े सिलकर परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाती हैं।
भविष्य शर्मा के शव को देख रोती बहन प्रिशा को ढांढस बंधाती परिवार की महिलाएं।
कानपुर: अलीगंज अग्निकांड में जान गंवाने वाले कानपुर के संयम विज व सूरजभान सिंह की कहानी हर किसी की आंखें नम कर रही है। दोनों बचपन के साथी थे। साथ खेलकर बड़े हुए, एक ही स्कूल में पढ़ाई की और एक ही क्षेत्र में करियर बनाया। इस दोस्ती का अंत बहुत दुःखद रहा।
स्वजन के मुताबिक, दोनों आग से बचने के लिए बाथरूम में छिपे थे। गोविंद नगर ए-ब्लाक निवासी 29 वर्षीय संयम विज का शव मंगलवार सुबह करीब 4:25 बजे घर पहुंचा, जबकि बर्रा-सात निवासी 29 वर्षीय सूरज सिंह का शव सुबह 6:45 बजे घर लाया गया।
संयम के रोते बिलखते स्वजन।
संयम की दादी ऊषा रानी का भी 17 दिन पहले निधन हुआ था, जिनका सत्रहवां संस्कार था। सूरज के मामा जितेंद्र ने बताया कि दोनों ने दून इंटरनेशनल स्कूल से इंटरमीडिएट की पढ़ाई साथ की थी।
पीयूष बाजपेयी, सीतापुर: अग्निकांड में जान गंवाने वाले कैथी टोला के आदित्य श्रीवास्तव का शव सोमवार रात करीब दो बजे घर पहुंचा तो पिता आलोक श्रीवास्तव के आंसू नहीं रुक रहे थे। वह विलाप करके बार-बार यही कह रहे थे कि उनके बेटे को लचर व्यवस्था निगल गई…।
कम से कम अब सरकार ऐसी व्यवस्था अवश्य कर दे, ताकि किसी और के साथ इस तरह की अनहोनी न हो। मंगलवार दोपहर शीतला देवी अंत्येष्टि स्थल पर अंतिम संस्कार किया गया और ताऊ विवेक सिन्हा ने आदित्य को मुखाग्नि दी। मां कल्पना श्रीवास्तव का रो-रोकर बेहाल हो रहीं थीं।
मृत आदित्य श्रीवास्तव का शव घर पहुंचने पर विलाप करतीं बहन व परिवरीजन।
आदित्य के पिता आलोक श्रीवास्तव ने भावुक होकर कहा कि उन्हें किसी प्रकार की आर्थिक सहायता की आवश्यकता नहीं है। सरकार की मदद से उनका बेटा वापस नहीं आ सकता। मेरी मांग केवल इतनी है कि इस घटना की निष्पक्ष व गहन जांच हो और जो भी जिम्मेदार हों, उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को ऐसी पीड़ा न झेलनी पड़े।
डीएम डॉ. राजा गणपति आर. ने संवेदनाएं व्यक्त की हैं। विधायक निर्मल वर्मा व ज्ञान तिवारी, पूर्व विधायक महेंद्र सिंह यादव आदि ने भी शोक व्यक्त किया।

