उस पार सिद्धलेख गांवपालिका-7 का पीपलटार, इधर गजुरी गांवपालिका का घाटबेसी। धादिंग जिले में त्रिशूली नदी पर बना झूला पुल दोनों गांवों के लिए सिर्फ रास्ता भर नहीं, सुगम जनजीवन का आधार था। घाटबेसी के बच्चे इसी रास्ते स्कूल जाते, पीपलटार के किसान सब्जियां लेकर गजुरी के बाजार आते।
त्रिशूली किनारे खड़े पीपलटार के 65 वर्षीय रमेश श्रेष्ठ कहते हैं, अपने जीवन काल में त्रिशूली का ऐसा रूप कभी ने देखा। जिनके घर-बार उजड़े वो तो कहीं का नहीं रहा, लेकिन पुल टूटने से परेशानी बढ़ी है वो भी किसी आपदा से कम नहीं।
इसी गांव पालिका की पानमती थापा को गर्भवती बहू की चिंता है। कहती हैं डाक्टर ने 10 सितंबर की डेट दी है। पुल होता तो दस मिनट में गजुरी पीएचसी पहुंच जाते। अब डेढ़ घंटे का रास्ता तय करना पड़ेगा। पहाड़ चढ़ते-चढ़ते ही कुछ हो गया तो।
पुलों की तबाही का सबसे बड़ा असर त्रिशूली और भोटेकोशी किनारे की बस्तियों पर पड़ा है। धादिंग, गोरखा, नुवाकोट और रसुवा में पुल टूटने से बाजार, स्कूल और अस्पताल तक पहुंच प्रभावित हुई है। किसानों की उपज बाजार तक पहुंचाना मुश्किल है और कई गांवों के बीच संपर्क टूट गया है। नेपाल के सड़क विभाग के अनुसार छह पुलों को भारी जोखिम के बावजूद बचा लिया गया है।
मितेरी पुल (रसुवागढ़ी), टिमुरे पुल-1 व 2, भोटेकोशी पुल (चिलिमे), चिलिमे खोला पुल, भोटेकोशी व स्याफ्रुबेसी क्षेत्र के बेलीब्रिज, स्याफ्रुबेंसी पुल और त्रिशूली-मैरुंग क्षेत्र के पांच पुल बह गए। मितेरी पुल टूटने से नेपाल-चीन व्यापार ठप है।
बेत्रावती के पुराने-नए पुल, त्रिशूली नदी पुल (तुप्चे), त्रिशूली बाजार के दो पुल, सिमचौर पुल, देवीघाट स्थित जलस्रोत विभाग व मध्यपहाड़ी राजमार्ग के पुल, तांदी खोला के दो पुल तथा त्रिशूली नदी के श्रीकाली, बुढसिंहघाट, रातमाटे और फोस्रेटार पुल बह गए।
धादिंग में 05 स्याल्टार सड़क पुल, घाटबेंसी पुल, फुर्के खोला पुल (मलेखु) और कोल्पु खोला के दो पुल ध्वस्त हैं। मास्तर पुल, जरेबगैंचा पुल और कोल्पु खोला का नया पुल क्षतिग्रस्त है। गोरखा को धादिंग और चितवन से जोड़ने वाले झूलापुल भी बह गए हैं। हालांकि गल्छी के पास भीमढुंगा-लामीडांडा, बेनीघाट और मुग्लिन के पुल बच गए हैं। सेना ने गल्छी से रसुवा तक वैकल्पिक मार्ग को भारी वाहनों के लायक बना दिया है, जिससे राहत सामग्री पहुंचनी शुरू हो गई है।

