हिंदू धर्म में मांसहार को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित है। शाकाहारी भोजन को हिंदू धर्म में उत्तम माना है लेकिन मांस खाने को लेकर कोई सख्त अनुदेश नहीं दिया गए हैं। इसी को लेकर एक शख्स ने प्रेमानंद महाराज जी से सवाल पूछा है। एक भक्त ने पूछा कि अगर मंदिर से लाया प्रसाद किसी को देते हैं और अगर वो इंसान मांसाहारी या अभक्ष पदार्थ आदि का सेवन करते है, तो पाप हमें तो नहीं लगेगा। चलिए जानते हैं इस प्रेमानंद महाराज जी का जवाब।
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि नहीं, अगर आप मंदिर का प्रसाद किसी मांसाहारी व्यक्ति को पवाते हैं, तो पाप आपको बिल्कुल नहीं लगेगा। बल्कि उसे प्रसाद जरूर दे देना चाहिए। क्योंकि यदि वो श्रद्धा से प्रसाद पाएगा, तो उसकी बुद्धि शुद्धि होगी। महाराज जी कहते हैं कि इससे वो एक दिन गंदे आचरण छोड़ देगा।
महाराज जी कहते हैं कि चरणामृत है, भगवत प्रसाद है, ये सब बुद्धि को पवित्र करता है। तो यदि हम ऐसे लोगों को भी प्रसाद देते हैं और वो प्रसाद का अनादर ना करते हो, तो देना चाहिए। वो आगे कहते हैं कि अगर वो आदर से प्रसाद पा लेते हैं, तो उसमें पाप नहीं लगेगा। उसमें पुण्य लगेगा। क्योंकि उसके पाप नष्ट होंगे, तो उसकी बुद्धि शुद्ध होगी और उसका कल्याण होगा।
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि पवित्र हो या अपवित्र हो, कोई विधि निषेध के बंधन में नहीं, उठते बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते, सोते-जागते, यदि हर समय भगवान का नाम जप करोगे, तो कल्याण होगा। महाराज जी कहते हैं कि इस संसार रोग की अचूक औषधि है, भगवन नाम। ये ब्रह्म राम से भी बढ़कर के राम नाम का नाम है। यह वर देने वालों को भी वर देने का सामर्थ प्रकट कर देता है। जैसे हमारे प्रभु वरदाता हैं, हम अपने प्रभु को भी वर देते हैं। हे श्यामा श्याम बलिहारी जाऊं, ऐसा आशीष करता हूं, कि आप दोनों ऐसे ही खेलते रहो, वृंदावन में।
महाराज जी कहते हैं कि वो बड़े भी भाग्यशाली उपासक हैं, जिनकी नाम में श्रद्धा हो गई है। हमारा तो जीवन ही नाम है। हमारा साध्य भी नाम है। हमारा साधन भी नाम है। हमारे हृदय में नाम के सिवाय और कोई महत्व नहीं है। ना लोक का, ना परलोक का, ना साधन का, ना साध्य का। नाम ही साधन है, नाम ही साध्य है। गुरु कृपा से एक बात बैठ गई कि कोई भी सेकेंड ऐस ना जाए, जिसमें हम नाम भूल जाएं।
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