उत्तर प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। भाजपा ने सरकार और संगठन दोनों मोर्चों पर चुनावी सरगर्मियां बढ़ा दी हैं। विपक्षी दल भी चुनाव में जुटे हैं। मगर भाजपा के सहयोगी दल कुछ सहमे-सहमे हैं। सीटों में कटौती न हो, इसलिए सबने लंबी-चौड़ी लिस्ट बनानी शुरू कर दी है। तेवर भी दिखा रहे हैं। कोशिश भाजपा पर दबाव बनाने की है। उधर, बिहार के बाद बंगाल की जीत से भगवा खेमे के हौंसले बुलंद हैं। पार्टी सहयोगियों को साथ तो रखना चाहती है, लेकिन बहुत दबाव में आने के मूड में नहीं है।
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में 376 पर लड़ी थी। 27 सीटें सहयोगी दलों अपना दल (एस) और निषाद पार्टी को दी थी। हालांकि, इनमें से तकरीबन आधी सीटों पर प्रत्याशी भाजपा ने ही दिए थे।
सुभासपा ने 62 सीटें चिह्नित की हैं। इनमें से 32 पर चुनाव प्रभारी भी नियुक्त कर दिए हैं। उधर, गोरखपुर से लेकर आजमगढ़, वाराणसी सहित नदी किनारे की पूरी बेल्ट में निषाद पार्टी पांव पसारने में जुटी है। वो भी करीब 50 सीटों पर खम ठोंकने की तैयारी में हैं। आजमगढ़ की अतरौलिया सीट तो ऐसी है, जहां सुभासपा और निषाद पार्टी दोनों ताल ठोंक रही है। अपना दल (एस) की डिमांड वाली सीटों की संख्या भी तकरीबन इतनी ही है। उधर, पश्चिम की जाट बेल्ट की सीटों पर रालोद की नजर है। यह सीटें सहारनपुर से लेकर आगरा की फतेहपुर सीकरी तक हैं। मोटा-मोटा गणित देखें तो यह संख्या 200 है।
दरअसल बिहार और बंगाल के नतीजों और फिर टीएमसी में मची भगदड़ ने विरोधियों की नींद उड़ाने के साथ ही सहयोगियों को भी असहज कर दिया है। वे जानते हैं कि भाजपा पर दबाव बनाने के लिए ज्यादा सीटों की डिमांड जरूरी है। उधर, भाजपा से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि टिकट बंटवारे में कोई दिक्कत नहीं आएगी। सब जानते हैं कि 2027 का चुनाव भी मोदी-योगी के चेहरे पर होगा। सभी सहयोगियों के सम्मान का ध्यान रखते हुए सीटें दी जाएंगी। फैसला केंद्रीय नेतृत्व करेगा।

