बीते दिनों 4 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में हुए चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन खास नहीं रहा। केरल को छोड़कर अन्य राज्यों में कांग्रेस को बड़ी सफलता नहीं मिली है जिसके बाद पार्टी के परफॉर्मेंस का एनालिसिस जारी है। इस बीच नतीजों के विश्लेषण से एक दिलचस्प ट्रेंड सामने आया है। आंकड़ों के मुताबिक कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की जीत में मुस्लिम उम्मीदवारों की भूमिका सबसे अहम रही। असम, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस ने जितनी भी सीटें जीती हैं, उसका बड़ा हिस्सा मुस्लिम बहुल इलाकों से आया है।
सबसे पहले असम की बात की जाए तो यहां कांग्रेस के प्रदर्शन ने सबको हैरान कर दिया है। यहां पार्टी के कुल 19 विधायकों में से 18 मुस्लिम समुदाय से हैं। वहीं जिन इलाकों में मुस्लिम आबादी अधिक है, वहां कांग्रेस को भर भर वोट मिले हैं। मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले गठबंधन के कुल 22 उम्मीदवारों को जीत मिली है। 22 में से 5 सीटें ऐसी हैं जहां 90 फीसदी मुस्लिम आबादी है, 6 सीटों पर 80 फीसदी से ज्यादा और 8 सीटों पर 60 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी है।
वहीं केरल में भी कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (UDF) की जीत में भी यही पैटर्न नजर आया। केरल के कुल 35 मुस्लिम विधायकों में से 30 अकेले UDF से हैं। UDF के इन 30 विधायकों में से 8 कांग्रेस के हैं और बाकी 22 उसकी सहयोगी पार्टी ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ (IUML) से हैं। कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों ने नीलांबुर, पोन्नानी, कलपेट्टा, अलुवा, अरूर, कोच्चि चदयामंगलम और वामनपुरम जैसी सीटों पर जीत दर्ज की। 2011 की जनगणना के मुताबिक, ये सभी सीटें या तो मुस्लिम बहुल हैं या वहां इस समुदाय की अच्छी-खासी आबादी है।
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भी कांग्रेस की जीत का आधार कमोबेश यही रहा। बंगाल में कांग्रेस केवल दो सीटें जीत सकी, फरक्का और रानीनगर। यह है कि ये दोनों ही सीटें मुस्लिम बहुल हैं। फरक्का में 67 फीसदी और रानीनगर में 80 फीसदी मुस्लिम आबादी है। दोनों ही सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। वहीं तमिलनाडु में कांग्रेस के विजयी उम्मीदवारों में एक मुस्लिम उम्मीदवार शामिल है।

